सपा-कांग्रेस की सियासी दोस्ती में मुस्लिम बहुल सीटें बनीं रोड़ा! वेस्ट यूपी की इन 60 सीटों पर दोनों की नजर
यूपी चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन तय है पर सीटों के बंटवारे को लेकर मामला फंसा हुआ है। कांग्रेस अधिकतर मुस्लिम बहुल सीटें अपने पास रखना चाहती है।

विशेष खबर प्रस्तुति- गौरव द्विवेदी(संपादक)खबर युग (Khabar Yug)
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आ रहा है। सभी सियासी दल चुनौती मानकर मिशन फतह की तैयारी में जुटे हैं। बड़ा पेंच गठबंधन की सियासत को लेकर हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच संभावित गठंबधन सीट बटंवारे को लेकर चर्चा में है। दोनों दलों के कुछ नेता गठबंधन को लेकर एक-दूसरे पर हमला बोलने में पीछे नहीं हैं। दोनों दलों के थिंकटैंक से जुड़े लोगों की माने तो यूपी की मुस्लिम सीटें अखिलेश यादव और राहुल गांधी की दोस्ती में मुश्किल बनी हुई है। दोनों ही पार्टियां ज्यादा से मुस्लिम बहुल सीटों को अपने पाले में रखना चाहती हैं।
कांग्रेस थिंक टैंक से जुड़े एक सीनियर पदाधिकारी ने बताया कि बीते कुछ वक्त से सूबे समेत पूरे देश में कांग्रेस का ग्राफ बढ़ा हैं। जनता की नजर में राहुल गांधी के जुझारूपन को स्वीकार किया जा रहा हैं। इसलिए कांग्रेस चाहती है कि वह अब अपने बल पर मजबूती के साथ चुनाव में उतरे। जहां जहां गठबंधन करना है, वहां भी सम्मानजनक सीटों के साथ आगे बढ़ा जाए।
छह लोकसभा की सभी विधानसभा सीटों पर लड़ने की इच्छा
यूपी में सपा का कांग्रेस से गठबंधन लगभग तय है, सीटों को लेकर पेंच फंसा हैं। इस पदाधिकारी के मुताबिक, कांग्रेस ने ज्यादातर मुस्लिम बहुल सीटों के साथ अपनी छह लोकसभा सीटों वाले इलाके पर लड़ने की मंशा जताई है। रायबरेली सीट से खुद राहुल गांधी सांसद हैं। अमेठी भी गांधी परिवार के असर वाली सीट है। वहां से किशोरी लाल शर्मा सासंद हैं। सहारनपुर से इमरान मसूद, बाराबंकी से तनुज पुनिया, सीतापुर से राकेश राठौर और इलाहाबाद से उज्ज्वल रमन सिंह सांसद हैं।
इन जिलों पर कांग्रेस की नजर
कांग्रेस की नजर 100 से 150 विधानसभा सीटों पर है। इनमें 50 से 60 सीटें ऐसी हैं जो मुस्लिम बहुल हैं। ऐसे सीटें वेस्ट यूपी में काफी हैं। रामपुर, मुरादाबाद, संभल, बिजनौर, सहारनपुर, शामली, अमरोहा, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलंदशहर, संभल, बरेली आदि जिले हैं। यहां मुस्लिम आबादी करीब 33 से 50 फीसदी है। रामपुर में सर्वाधिक है। सहारनपुर में तो कांग्रेस सांसद इमरान मसूद सभी विधानसभा सीटें कांग्रेस के लिए चाहते हैं।
कांग्रेस चाह रही 80 के दशक वाला साथ
दरअसल, कांग्रेस की सोच है कि उनको मुसलमानों का साथ 80 दशक तक जिस तरह मिलता था, आगे भी उसी तरह मिलने लगेगा। कांग्रेसियों का मानना है कि यह तभी संभव होगा जब मुस्लिम बहुल जिलों और सीटों पर उनके कैंडिडेट चुनाव लड़ें, जीतें और उनकी सेवा करें। दूसरी ओर, सपा का मानना है कि यूपी में भले ही वह पीडीए की सियासात को धार दे रहे हों, लेकिन उसका सबसे बड़ा और मजबूत जनाधार मुस्लिम ही है। मुस्लिमों के बल पर वह सत्ता हासिल करती रही है। इसलिए वह मुस्लिम बहुल जिलों और सीटें कांग्रेस को देकर खुद से अलग नहीं करना चाहती।
सपा को मुस्लिम वोटर छिटकने का डर
सपा नेताओं को डर है कि आज गठबंधन भले ही वक्त की जरूरत हो, लेकिन लंबे वक्त तक कांग्रेस के साथ मुस्लिमों का जुड़ना नुकसानदेह साबित हो सकता हैं। सपा का मानना है कि अगर मुस्लिम कांग्रेस के हाथ पर वोट डालने का आदी हो गया, तब सपा को उसकी सीधा नुकसान होगा। ऐसे में सपा जब कभी अकेले चुनाव लड़ेगी, तब उसको मुस्लिमों के खुद से छिटकने का खतरा रहेगा।
मुस्लिमों के मन में राहुल गांधी के लिए नरमी: राजनीतिक विश्लेषक
रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर और सियासत पर नजर रखने वाले एमबी जैदी का कहना है कि सपा और कांग्रेस की नजर मुस्लिमों पर है। दोनों की पहली पसंद फिलहाल मुस्लिम हैं। कांग्रेस में राहुल गांधी की भूमिका फिलहाल मजबूती से सामने आ रही हैं। मुस्लिमों के मन में राहुल गांधी के लिए नरमी दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषक हरि शंकर जोशी का कहना है कि सपा को डर कांग्रेस से दोस्ती में सिर्फ मुस्लिमों के खिसकने का है। सपा की कोशिश मुस्लिम बहुल ज्यादातर सीट अपने पास रखने की होगी।
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