'महाराष्ट्र जैसी टूट की ओर बढ़ रही है ममता बनर्जी की पार्टी TMC'
ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय गंभीर संकट का सामना कर रही है। पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह और नेता के बयानों ने इसे महाराष्ट्र की स्थिति की ओर अग्रसर कर दिया है।

पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदर बहुत बड़ी बगावत और ऐतिहासिक दलबदल की स्थिति बनी हुई है, जिसके कारण राज्य की राजनीति में ‘महाराष्ट्र मॉडल’ यानी ‘शिवसेना और एनसीपी में फूट’ दोहराए जाने की प्रबल संभावना बन गई है. हाल ही में राज्य में सत्ता परिवर्तन और शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई में बीजेपी सरकार बनने के बाद से ही टीएमसी में बिखराव का खौफ मंडराने लगा है.
पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 59 बागी विधायक आज बुधवार को विधानसभा स्पीकर के चैंबर गए. वहां बागी गुट ने अपना नया गुट बनाने और मुख्य विपक्षी दल होने का दावा पेश किया. दावा है कि इन बागी विधायकों ने ‘नई टीएमसी’ बनाने को लेकर पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, साथ ही विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता देने की मांग भी की है.
दलबदल विरोधी कानून का गणित
भारत के दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत किसी भी दल से अलग होने वाले गुट को अयोग्यता से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई विधायकों का समर्थन होना जरूरी है. ऐसे में विधानसभा में टीएमसी के पास कुल 80 विधायक हैं. इस लिहाज से कानूनन अयोग्यता से बचने के लिए न्यूनतम 54 विधायकों की जरूरत हैं. लेकिन बागी गुट के पास 59 विधायकों का समर्थन होने की वजह से वे तकनीकी रूप से अयोग्य होने से बच सकते हैं और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर भी अपना दावा ठोंक सकते हैं.
दलबदल मामले में स्पीकर की भूमिका अहम हो जाती है. संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून, 1985) के तहत सदन के स्पीकर के पास दलबदल के मामलों में सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की शक्ति है. दलबदल के मामलों में स्पीकर के पास अयोग्यता पर फैसला लेने का अधिकार होता है. सदन का कोई सदस्य (सांसद या विधायक) दलबदल का दोषी है या नहीं, इस पर फैसला करने का पूरा अधिकार स्पीकर (राज्यसभा/विधान परिषद में सभापति) के पास ही होता है.
यदि सदन का कोई सदस्य या राजनीतिक दल किसी अन्य सदस्य के खिलाफ दलबदल की शिकायत दर्ज करता है, तो स्पीकर उस पर सुनवाई करते हैं. 10वीं अनुसूची के पैराग्राफ 8 के तहत, स्पीकर को दलबदल विरोधी प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम और कार्यप्रणाली बनाने का अधिकार है. इसी शक्ति के तहत लोकसभा और अलग-अलग विधानसभाओं में ‘दलबदल के आधार पर अयोग्यता नियम’ बनाए गए हैं.
विलय को मान्यता देना या खारिज करना
बागी गुट में बहुमत की जांच को लेकर 91वें संविधान संशोधन (2003) में व्यवस्था की गई है. इसके अनुसार, यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) किसी अन्य दल या गुट में शामिल होते हैं, तो उसे वैध विलय माना जाता है. साथ ही यह तय करने का अधिकार भी स्पीकर के पास ही होता है कि क्या यह विभाजन या विलय कानूनी शर्तों को पूरा करता है या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने किहोतो होलोहान मामले (1992) में साफ कर किया था कि दलबदल मामले में फैसला सुनाते समय स्पीकर एक ‘न्यायाधिकरण’ के रूप में कार्य करते हैं. इसलिए, उनके अंतिम फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
हालांकि मूल कानून में यह तय नहीं है कि स्पीकर को कितने समय के अंदर दलबदल याचिका पर फैसला करना होगा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देशों में इसे आमतौर पर 3 महीने के भीतर तय करने की सलाह दी है. साथ ही इस प्रक्रिया के दौरान स्पीकर संबंधित सदन को अपना पक्ष रखने के लिए ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर सकते हैं.
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